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How to Cultivate Ginger

अदरक की खेती किस प्रकार करें ? अदरक की खेती मसाला और औषधीय फसल के रूप में की जाती है ǀ अदरक की उत्पत्ति दक्षिण पूर्वी एशिया में भारत या चीन में हुई माना जाता है ǀ अदरक भारत की स्वदेशी और नगदी फसल है


Published: February 4th, 2021


How to Cultivate Ginger

अदरक की खेती मसाला और औषधीय फसल के रूप में की जाती है ǀ अदरक की उत्पत्ति दक्षिण पूर्वी एशिया में भारत या चीन में हुई माना जाता है ǀ अदरक भारत की स्वदेशी और नगदी फसल है, यह भारत के सम्पूर्ण हिस्से में उगाई जाती है ǀ भारत अदरक का आयत कर काफी विदेशी मुद्रा प्राप्त करता है विश्व के कुल उत्पादन का 60% उत्पादन भारत में होता है ǀ छीले हुए अदरक को चूने के पानी में 6 घंटे तक डुबाकर फिर सुखाकर सौंठ बनाई जाती है ǀ
जिसका उपयोग कई दवाओं में किया जाता है तथा अदरक का प्रयोग आचार, चटनी और सब्जी के तौर पर किया जाता है ǀभारत में लगभग 37000 हेक्टेयेर भूमि पर इसकी खेती की जाती है जिसमे 54000 टन शुद्ध अदरक का उत्पादन होता है ǀ

अदरक के लिए जलवायु और भूमि : अदरक के लिए गर्म एवं नम जलवायु उपयुक्त रहती है ǀ इसके लिए 19 से 28 डिग्री से.
तापमान अच्छा रहता है, इसको छाया वाले स्थानों पर भी उगाया जा सकता है ǀ

 समुद्र तल से 1500 मीटर की ऊचाई वाले क्षेत्र में इसकी खेती की जा सकती है ǀ
 अदरक की खेती सभी प्रकार की भूमि पर की जा सकती है परन्तु दोमट बलुआ, लेटराईट, लेटराईट दोमट एवं कीवाल दोमट बेहतर विकल्प है ǀ जिसका पीएच मान 6.0 से 6.5 के मध्य होना चाहिए ǀ
 जल निकासी के लिए अच्छी व्यवस्था एवं छायादार भूमि का चयन करना चाहिए एवं एक ही खेत में लगातार अदरक की फसल नही बोनी चाहिए ǀ

खेत की तैयारी और खाद उर्वरक प्रबंधन :
 खेत की पहली जुताई मिट्टी पलटने वाले हल से करनी चाहिए ǀ इसके बाद 5 से 6 जुताई देशी हल या कल्टीवेटर से करनी चाहिए ताकि मिट्टी भुरभुरी हो जाये इसके बाद पाटा लगा देना चाहिए ǀ
 अदरक की फसल के लिए दूसरी या तीसरी जुताई में 250 से 300 क्विंटल कम्पोस्ट या गली सडी गोबर की खाद डालनी चाहिए ताकि वह अच्छे से मिट्टी में मिल जाये ǀ इसके साथ-साथ 100 किलोग्राम नाइट्रोजन, 60 किग्रा. फास्फोरस और 50 किग्रा. पोटाश प्रति हेक्टेयर डालनी चाहिए ǀ
 नाइट्रोजन की आधी मात्रा और फास्फोरस व पोटाश की पूरी मात्रा आखिरी जुताई के समय डालनी चाहिये नाइट्रोजन की बची हुई मात्रा दो बार एक बुवाई से 25 से 30 दिन बाद और दूसरी 50 से 60 दिन बाद आधी-आधी देनी चाहिए |

बुवाई : अदरक बोने के लिए ताजा एवं उत्तम गुणवत्ता वाले प्रकंद किसी ऐसे स्रोत से प्राप्त करे जिस पर आपको भरोसा हो प्रति हेक्टेयर 58000 यानि की लगभग 1160 किलो तक प्रकन्द बोये जा सकते है | प्रकंदों को 2 से 3 आँख वाले 20 ग्राम के टुकड़ों में काटा जा सकता है | अदरक को बोने के लिए छोटी-छोटी लगभग 1 मीटर चौड़ी व 15 सेमी. ऊंची बेडो में बाँट दे ǀ पौधों के बीच की दूरी 20 सेमी. होनी चाहिए और बीज 5 सेमी. की गहराई में लगाये | बीज प्रकंद में कम से कम 2 स्वस्थ आँखों का होना आवश्यक है जोकि रोपाई के समय ऊपर की तरफ रखी जाये | बुवाई के पहले कंदों को 2ग्राम कार्बेन्डाजिम या बाविस्टिन या 2.5 ग्राम मेन्कोजेब से प्रति किलोग्राम बीज को पानी में 25 से 30 मिनट डुबोकर उपचारित करना चाहिए |

अदरक की उन्नत प्रजातियाँ :-
आई एस आर वरदा : यह किस्म 200 से 210 दिन में तैयार हो जाती है, इसकी पैदावार 16 से 17 टन प्रति हेक्टेयेर है |

सुप्रभा : यह किस्म 225 से 235 दिन में तैयार हो जाती है, इसकी पैदावार 16 से 17 टन प्रति हेक्टेयेर है |

सुरुचि : यह किस्म 215 से 225 दिन में तैयार हो जाती है, इसकी पैदावार 11 से 12 प्रति टन प्रति हेक्टेयेर है |

सुरभि : यह किस्म 220 से 230 दिन में तैयार हो जाती है, इसकी पैदावार 17 से 18 टन प्रति हेक्टेयेर है |

हिमगिरी : यह किस्म 225 से 235 दिन में तैयार हो जाती है, इसकी पैदावार 13 से 14 टन प्रति हेक्टेयेर है |

आई एस आर महिमा : यह किस्म 195 से 205 दिन में तैयार हो जाती है, इसकी पैदावार 23 से 24 टन प्रति हेक्टेयेर है |

आई एस आर रजाता : यह किस्म 195 से 205 दिन तक तैयार हो जाती है |इसकी पैदावार 22 से 23 तन प्रति हेक्टेयेर है |
इसके अलावा कार्तिका, अथिरा आदि उन्नत किस्मे भी 200 दिन में तैयार हो जाती है |

सिंचाई : बीज रोपण के बाद हल्की सिंचाई करनी चाहिए | इसके बाद यह वर्षा ऋतु की फसल है पानी की ज्यादा आवश्यकता नही पड़ती लेकिन यदि बारिश नही होती है तो 10 से 15 दिन के अंतराल में आवश्यकतानुसार सिंचाई करनी चाहिए |

अदरक के रोग और रोकथाम :
1. अदरक की फसल में मृदु विगलन, जीवाणु म्लानि, पर्ण चिट्टी और सूत्रकृमि रोग प्रमुख है इनकी रोकथाम के लिए बीज को अच्छे से उपचारित कर के बुवाई करनी चाहिये | रोग रोधी किस्म का चुनाव करना चाहिए, रोगी पौधों को उखाड़ कर मिट्टी में दबा देना चाहिए | इसके साथ-साथ 2 ग्राम गंधक प्रति लीटर पानी और 0.5 प्रतिशत पानी मिथाइल डेमेटान 1 मिलीलीटर प्रति लीटर पानी की दर से छिडकाव करते रहना चाहिए |
2. अदरक की फसल में तना बाधक, राइजोम शल्क और लघु कीट जैसे कीट लगते है इनकी रोकथाम के लिए मैलाथियान, डाइमेथोय और क्यूनाल्फोस तीनो में से 1 मिलीलीटर दवा और 1 लीटर पानी की दर से छिडकाव करना चाहिए | इसके बाद क्लोरोफयफिरासका चूर्ण प्रति हेक्टेयेर के हिसाब से राख में मिलाकर छिडकाव करना चाहिए |

अदरक की खुदाई : रोपाई के 5-7 महीने बाद अदरक तैयार हो जाती है , सूखे मसाले एवं तेल के लिए अदरक को 250 दिन में उखाड़ लेना चाहिए | देरी होने से तेल की मात्रा घाट जाती है और रेशे की मात्रा बढ़ जाती है |

पैदावार : उपरोक्त विधि और अनुकूल मौषम से खेती करने के बाद 150 से 180 टन प्रति हेक्टेयेर की दर से फसल प्राप्त की जा सकती है |
किसान भाई यदि मंडी में ले जाने पहले अगले साल के लिए बीज प्रक्न्दो का भंडारण करे तो यह एक होशियारी भरा कदम है |

“अदरक से आय उसके बाजार मूल्य पर निर्भर करती है | यदि इसकी खेती सिंचित अवस्था में की गयी है यह जल्दी तैयार हो जाता है और अच्छा मूल्य मिल जाता है | अदरक की फसल का एक तिहाई अपरिपक्व अवस्था यानी 5 से 6 महीने में निकल लेनी चाहिए | इस समय बाजार मूल्य अधिक रहता है और बचे हुए हिस्से को तैयार हो जाने पर निकालना चाहिए | किसान भाइयों हम एक बात आपको जरूर बता देना चाहेंगे कि चाहे आप अदरक की खेती कर रहे हो या फिर खेती करने के बारे में सोंच रहे है आप को पहले से समय पर तैयारी करनी होगी, उन्नत किस्म के बीजों ,प्रक्न्दों का इस्तेमाल करना है और बाजार का अध्ययन पहले से कर के रखना है | “

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